रविवार, 4 मार्च 2012

GAJAL

जोइड़ अपन ह्रदय अहाँ सँ


तोइड़ देलहूँ सम्बन्ध जहाँ सँ


रहब सदिखन संगे खेलहूँ शपति

छोइड़ देलहूँ जखने पड़ल विपति


मनक आश हमर मने रहिगेल

जखन अहाँ अपन मुँह फेरिलेल


सुतल फूलक सेज पर अहाँ, मुस्किआइत छी

जारि प्रेमक चिता पर हम , धुधुआइत छी


नोर नै बहाऊ "गणेश" हुनका लेल

छोइड़ अहाँक जे केकरो अनकर भेल


:गणेश कुमार झा "बावरा"

गुवाहाटी

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

Kavita-- VIAAH

"विआह"


सुनि गप्प विआह कें

मन अध्हर्षित अध्दुखित भेल |


सुझाए लागल ब्रह्माण्ड हमरा

तन-मन आकुल-व्याकुल भेल ||



क्षणिक सोइच आनन्द विआह कें

हम कुदअ लगलौं चाईर-चाईर हाथ |


द' चौबनियाँ मुस्कान

हम गुद्गुदाए लगलौं भईर-भईर राइत ||



नै छलौं देखने हुनका

नै छल हुनकर कोनो ज्ञान |


नै जानि तइयौ हुनके

कियाक बुझैत छलौं अपन प्राण ||



अचानक केखनो क' हमरा

मन मे भ' जाइत छल  साइत --

नै जानि ओ केहन हेती

अनाड़ी हेती या व्यावहारिक हेती !

बुझल छल हमरा एतबाए

हुनक व्यस(उम्र) छनि सोलह साल |


तांए डेराइत छलौं हम

कोना करब "प्रेमक' बात ||



बुझल छल हमरा एतबाए

ओ नैन्ना हम स्यान |

तांए डेराइत छलौं हम

कोना करब एकहि घाट हम स्नान ||



मुदा मन के बुझअलौं- की करबअ ?

मिथिला कें छै इहाए विधान

"कनियाँ नैन्ना " आ "वर स्यान " ||



:गणेश कुमार झा "बावरा"

गुवाहाटी

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

Kavita--GARIB

"गरीब"


विचित्र विधान अहि संसार कें--

जे पसीना बहा उपजाबैथ रोटी

हुनके तन नै दुई हाथक धोती !

जिनक पसीनाक कमाए सँ

सेठ-साहूकार भरैथ अपन कोठी

हुनके भेटैत छनि दरिद्र आ गरीबक उपाधि !

जिनक मेहनत सँ भड़ल अछि राजाक बखाड़ी

वाएह समाज मे बनल छैथ भिखाड़ी !

जिनक रक्त सँ इजोत अछि नगर

हुनके घर नै जारि दिया- बाती !

नित्य सत्ताक उलट-फेर होइत अछि--

हुनके नाम पर

नित्य राजाक आदेश होइत अछि--

हुनके लेल

मुदा नै जानि --

कोन जिन घुसल अछि ?

जे सब हजम क' जाइत अछि रस्ते मे !

अनेकों रियायत अनेकों कोष

वोटक दिन मे अनेरोक जोश

चुनावक बाद सब बेहोश

ज धोखो सँ किछु हुया

त बाबू-भैया करैथ भोग !!

:गणेश कुमार झा "बावरा"

गुवाहाटी

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

Kavita--Lakshman Rekha

" लक्ष्मण-रेखा "


चारू दिश हो हल्ला मचल छै

कियाक लंघली सीता लक्ष्मण रेखा ?

की हुनका मर्यादाक ख्याल नै छलनि ?

मुदा ऐ काना-फुसकी मे

लोक एक गप्प बिसैर जाइत अछि ---

ज सीता नै लंघितैथ लक्ष्मण-रेखा

त कोना बालीक वद्ध होइतै

कोना सुग्रीव के राजगद्दी भेटीतै ?

ज सीता नै लंघितैथ लक्ष्मण-रेखा--

त कोना रावणक वद्ध होइतै

कोना विभीषण के राजतिलक होइतै ?

आइ समाज मे खींचल अछि बहुतो लक्ष्मण-रेखा

की थिक केयो दोसर-----सीता ?????

:गणेश कुमार झा "बावरा"

गुवाहाटी

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

Hindi Kavita--MANAV

"मानव"



हे मानव !


उठो, आँखें खोलो, देखो


कितने धन्य हो तुम !


स्वयं रवि जगा रहे है


आकर तुम्हारे चौखट पर ,


चिड़ियाँ चुन-मुन कर ,


कोयलिया गा कर मीठी गीत ,


सागर की लहरों से उठती


सर्द हवाओं की टोली ,


बगीचों से आती


खुशबूदार फूलों की खुश्बू,


सब खड़े है


तुम्हारे स्वागत को !


पर तुम हो !


बिना मोबाइल के


टन-टन सुने उठते नहीं,


बिना सिगरेट का धुआँ छोड़े


तुम्हारी नींदे टूटती नहीं !


फिर दिन भर भागम-भाग ,


कितने झूठ , कितने फरेब ,


एक- दूसरे को पटकने की होड़ ,


मानव मानव का दुश्मन


मानवता का न कोई नामो-निशान !


क्यों मानव ? क्यों ये सब ?


क्या यही विकाश हैं ?


क्या भौतिक सूख प्राकृतिक सूखों से बड़ी हैं ?


क्यों तोड़ रहे है हम


प्राकृतिक नियमों को ?


हे मानव ?


सब को अधिकार हैं जीने का


सब को स्वतंत्र जीने दो


विकाश करो !


पर मानवता को न अवरुद्ध होने दो !!!


:गणेश कुमार झा "बावरा"


गुवाहाटी





कविता - साम्प्रदायिकताक आगि

"साम्प्रदायिकताक आगि"



नै लगाऊ साम्प्रदायिकताक आगि


एहि मे होएब हम सब जरि क छाई


एहि आगि मे हम जरि वा आहाँ


मुदा, होएत कुनू 'नैन्ना टुगर


हेती केयो 'स्त्री विधवा'


हेता केयो 'पिता नि:संतान' !!


एहि सँ नै आहाँ बनब नै हम


बस उजरत एक बसल बैसाएल घर !


राजनेता के की जाईत छै


ओ अपन कुर्सी हथिअबैया


कनैत-खिंझैत जनता अछि मरैत


मुइला के बाद


के अछि पूछैत ?


एहिलेल कहै छी


समय रहैत सजग भ जाउ


"साम्प्रदायिकताक आगि नै लगाऊ"


:गणेश कुमार झा "बावरा"


गुवाहाटी