शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

pathik

मैँ पथ का पथिक अकेला,
 छोड़ दिया सब साथ मेरा,
 पर मैंने स्वयं को नहीं छोड़ा,
न मुशिबतों से कभी डरा,
 न असफलताओं से माना हार,
जो मिला स्वीकार किया और 
निरन्तर अपने कर्म पथ पर चलता रहा,
 क्योंकि पता था मुझे,o
राहें मंजिल का ये अन्त नहीं,
इसलिए राहें मंजिल में जब,
 थक हार बैठ जाता हूँ-
तो मंजिल कहती है मुझे,
 उठो राही राह छोड़ों नहीं,
 बस मैं करीब हूँ,
फिर उठता हूँ बढता हूँ आगे,
आँखों में आशाओं के दीप जलाए हुए,
मैं पथ का पथिक अकेला..