व्यग्र अछि मन हमर, उग्र होबे लेल आतुर अछि, मुदा एहन संस्कार हमर, मन हमर साधल अछि । मुदा, की करब राखि संस्कार, जखन खतरा मे अछि पुरा मैथिल सभ्यता, आब बने पड़त परशुराम...क्रांति...जय मिथिला
मैँ पथ का पथिक अकेला, छोड़ दिया सब साथ मेरा, पर मैंने स्वयं को नहीं छोड़ा, न मुशिबतों से कभी डरा, न असफलताओं से माना हार, जो मिला स्वीकार किया और निरन्तर अपने कर्म पथ पर चलता रहा, क्योंकि पता था मुझे,o राहें मंजिल का ये अन्त नहीं, इसलिए राहें मंजिल में जब, थक हार बैठ जाता हूँ- तो मंजिल कहती है मुझे, उठो राही राह छोड़ों नहीं, बस मैं करीब हूँ, फिर उठता हूँ बढता हूँ आगे, आँखों में आशाओं के दीप जलाए हुए, मैं पथ का पथिक अकेला..
अकेले हम आए जहां में
अकेले है जाना जहां से
फिर हम क्यूँ किसी से
करते है आशा जहां में.…
मतलब की है ये दुनियाँ
मतलब की है सारे नाते ….
जिस डगर हम चले है जहां में
उसकी न कोई मंजिल हैं
अनन्त है ये दुनियाँ
इसकी न कोई डगर हैं.…
किस डगर मैं जाऊँ
डगर की न कोई खबर हैं.…….