शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

kavita...हम नेन्ना रहितौं

"हम नेन्ना रहितौं"
काश! हम नेन्ना रहितौं
सदैव निश्चल निर्मल कोमल रहितौं !!!
अपन आनक भेद नहि उपजैत
माए बाबू कक्का काकी
सभक हम दुलारु रहितौं
काश! हम नेन्ना रहितौं
सदैव निश्चल निर्मल कोमल रहितौं !!!
नहि जनितौं कोनो सीमा रेखा
नन्हिएटा पएर ल घुमि अबितौं
टोल परोसक दुरा-दरवजा
अपन मनक राजा रहितौं
काश! हम नेन्ना रहितौं
सदैव निश्चल निर्मल कोमल रहितौं !!!
नहि रहैत पेटक चिंता
नहि डेराबैत बेरोजगारीक भूत
रणे बणे नहि बौअइतौं
अपने गाम धेने रहितौं
काश! हम नेन्ना रहितौं
सदैव निश्चल निर्मल कोमल रहितौं !!
:गणेश मैथिल

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

geet...chhathi maike

उगियो यौ
सुरुजदेव जल्दी जल्दी
हाथ नारीयल लेने
पानि तरमे ठाड़ छथि
घाटे घाटे सब व्रतधारी
उगियो यौ
सुरुजदेव जल्दी जल्दी...
रंग-बिरंगक पकवान सँ
अछि डाला साजल
अर्घ देबअ लेल
छथि आतुर सब व्रतधारी
उगियो यौ
सुरुजदेव जल्दी जल्दी....
हे सुरुजदेव
चारू दिश पसरै खुशहाली
ज्ञानक ज्योति जरै चारू दिश
कल जोड़ि करैथ विनती
सब व्रतधारी
उगियो यौ
सुरुजदेव जल्दी जल्दी...
आहाँक महीमा देव
अछि बड्ड भारी
मनवांछीत फल पाबैथ
सब व्रतधारी
उगियो यौ
सुरुजदेव जल्दी जल्दी....

उठ रे बौआ"

"उठ रे बौआ"
उठ रे बौआ भेलै भोर
सगरो दुनियाँ करै कलोल
कहियाधरि भांग खाए
रहबाए तूं भकुआएल ?
देखहीं सगरो दुनियाँ
आइ छै अगुआएल
आब नहि छौ भड़ल
बाबाक बड़का भखाड़ी
उसड़ पड़ल छौ
खेत-खरीहान आँगन-बाड़ी
ताशक तमाशा देखने
की पेट भड़तौ ?
बीपीएलक चाउर गहुम खेने
की जिनगी कटतौ ?
चौक चौराहा पर भाषण झाड़ने
मुँहमे जरदा पान गलौठने
की बनबे नेता ?
दियादी झगड़ा केने
एक दोसराके खसेने
की भेटतौ तमगा ?
रे अभागा
कने अपन इतिहास भूगोल त पढ़
जानि अपन पहचानि अपन शक्ति
सगरो दुनियाँमे ताल त ठोक
उठ रे बौआ भेलै भोर
सगरो दुनियाँ करै कलोल !!!!"
:गणेश मैथिल

रविवार, 25 अक्टूबर 2015

कविताः देवक लीलि

पाथर बनल छै आँखि ओकर
एकहि दिश छै लगेने टकटकी
नहि हर्षमे, नहि विषादमे
ओ बहाबैत छै नोर
पूर्वा-पछवा बहै
चाहे बहै कोनो बसात
ओकरा पर नहि होइछै
कोनो बसातक असरि
ओ पहिने एहन नहि छलहि
हरदम फूल जेना मुस्काइत छलहि
गाबैत छलहि नाचैत छलहि
अपन आँचर सँ स्नेह उड़ाबैत छलहि
मुदा एक दिन डोललै हिमालय
कराहि उठलै धरती
तर तर फाटै लगलै
समाए लगलै
लोक-बेद घर-द्वार धरती
खिलखिलाइत फूल मुर्झा गेलहि
देखिते देखिते आँखिक सोझा
उजरि गेलहि ओकर संसार
मुदा बाँचि गेलहि ओ अभागीन
देखअ लेल देवक अभिषाप
बड्ड देवता पितर पूजैत छलहि
सदिखन पाथर पर माथ रगड़ैत छलहि
मुदा हाय रे देवक लीला
आइ ओ स्वयं पाथरक बूत बनल छलहि !!!!!!!
:गणेश मैथिल, गुवाहाटी

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

kavita...

इ की हो रहल हइ देशमे
स्थिर सरकार हो रहल हइ अस्थिर
सभे ठार हो रहल हइ विरोध मे
तिरंगा फहराए लागल रहलै ह'
देश आ विदेश मे
मुदा चन्द राजनैतिक रावण नेतबा
अपन राजनीतिक रोटी पकबे खातीर
क' रहलै ह' बदनाम
देशक नाम देश आ विदेशमे !!
अइ देशक जनताके
न चाही विकाश
न चाही काम-धन्धा
खैरातमे चाही खाना पानी
चाहे गद्दीधारी लूटौ देशक खजाना !!
गोलबन्द भ रहल हइ आजुक जयचन्द
असगर कर्मयुद्धमे फँसल हइ पृथ्वीराज
फेर लागल हइ दाँव पर
इज्जत माइ भारतीके
हे हिन्द मानव
करहो फैसला
केकरा जीतेबहो
पृथ्वीराज वा मोहम्मद गोरीके ???

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

कतौ बिला गेल शांति
बात बात पर उन्माद
चारु दिश अछि पसरल
जाति-पाति धर्मक जाल ।
खत्म भ गेल सहनशीलता
भ गेल खत्म स्नेह-व्यवहार
बुढिया-फुसि बात मे
लोक फुकि  दैत अछि
एक-दोसरक घर ।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

नाटकःजागु 10

नाटकःजागु
दृश्यः दश
समयः भोर
स्थानःबिल्टूक घरक दृश्य
(स्टेज पर बिल्टू घर मे पूजा पर बैसल अछि)
विष्णु देवः(नेप्थय सँ) बिल्टू! बिल्टू!!(हाक दैत)
बिल्टू: के ???
वि0दे0: हम !!!
बि0:(धरफराइत उठैत) भाई जी !! याह एलौं...(विष्णु देवक प्रवेश, बिल्टू पएर छू गोर लगैत)
वि0दे0:'आयुष्यमान भवः', 'यसस्वी भवः'
बिल्टूः (कुर्सी दैत) आउ बैसू
वि0दे0:(बैसत) हम भोरे भोर मधुर खेबाक लेल एलहुँवा । आईके अखबार पढलहकाए ??
बिल्टूः की भेलहिया ? की रामनारायण बाबू चुनाव जीत गेला ??
वि0दे0: राम बाबू त जीतबे करता, मुदा, आई हमर गाम जीतलाए ! हमर गामक नाम अखबारक मुख्य पृष्ठ पर छपल अछि !! (गोर्वान्वित होइत)
बिल्टूः से किएक ?
वि0द0: ओ आहाँक कारण...
बिल्टूः (आशचर्यचकित भाव)...हमरा कारण ??? भाई जी, हम गप नहि बुझलौं !!!!
वि0दे0:(अखबार देखबैत)..हौ तूं "कलेक्टर" बनि गेलअ, कलेक्टर !! एहि गामक पहिल कलेक्टर , ओहो भारत मे प्रथम स्थान ....
बिल्टूः(खुशी सँ)...की कहलौं, हम कलेक्टर बनि गेलौं !! हे भगवान ! आहाँक कोटि कोटि धन्यवाद !! आइ आहाँ हमर भक्ति, आराधना आ विश्वाशक फल देलौं ।(माए बाबूके फोटो लंग जा प्रणाम करैत) भाई जी, आइ हमर माए बाबू बड्ड प्रसन्न हेता' । हमर ई सफलता हुनके लोकनिक आर्शिवादक फल अछि ।
वि0द0: मात्र तोरे माए- बाबू नहि, आइ एहि पावैन अवसर पर पूरा समाज हर्षित अछि ! आइ ई समाज तोरा पर गर्व महसूस क रहल अछि !! तोहर ई सफलता सिद्ध क रहल अछि कि जँ आत्मविश्वाश, हौसला आ किछु क गुजरबाक इच्छा हुए त कोनो वस्तुक प्राप्ति असम्भव नहि । तूं समाज लेल एक आदर्श छ ।।
बिल्टूः भाई जी, हमर एहि सफलताक पाछाँ एहि समाज आ आहाँ लोकनिक बड्ड पैघ हाथ अछि । माए-बाबूक मुइला उपरान्त हम हिआउ हारि गेल रही, मुदा, ई समाज हमरा बड्ड सहयोग केलक । हम एहि समाजके सदा त्रृणी रहब ।
वि0दे0: बस...!! जिनगी मे सदैव याह गप मुन राखब ! समाज सँ पैघ केयो नहि होइत अछि । चाहे कतबो पैघ हाकिम बनि जाइ, मुदा, समाजके कहियो नहि बिसरब । सदा हमर एहि गपके मुन राखब-----
"जेना कृषक वर्षाके बाट तकैया, तहिना समाज सदैव प्रतिभावान पुतके बाट जोहैया"...
बिल्टूः भाई जी. हम वचन दैत छी--हम सदैव समाजके प्रति सजग, संवेदनशील आ कर्त्तव्यनिष्ठ रहबाक प्रयास करब ।।
वि0दे0: हमरा तोरा सँ याह उम्मिद अछि  !!
बिल्टूः भाई जी, हम अपन कमाईके किछु हिस्सा सदैव ' सम्पूर्ण शिक्षा अभियानके' दैत रहब , आइ सँ एकर संचालनक भार हम आहाँके सोपि रहल छी, हमरा त असली सफलता ओहि दिन भेटत जहिया गामक एकटा व्यक्ति अशिक्षित नहि रहत !!
वि0दे0: हम ई भार सहर्ष स्वीकार करैत छी आ प्रयास करब कि हम आहाँक सपनाके पूरा करी ।..आब चलू समाजक लोक आहाँक अभिनन्दन लेल बेकल छैथ
(प्रस्थान, पटाक्षेप, दोसर पर्दा पर टेबुल कुर्सी लागल आ दस बिस लोक फुल माला ल बैसल, विष्णुदेवक संग बिल्टूक प्रवेश, अभिनन्दन कार्यक्रम होइत अछि)
बिल्टूः (आँखि सँ खुशीक नोर पोछैत)...समस्त गामवाशीके हमर प्रणाम !! आहाँ  लोकनिक असीम स्नेह आ सहयोगक बलबूते आइ हम ई सफलता प्राप्त क सकलौं ! एहि हेतु हम सदैव आहाँ सभक त्रृणी रहब ! हम एकहिटा गप कहब--प्रत्येक पाथर हीरा अछि, बस, ओकरा तरसबाक आ परखबाक जरूरत अछि । गाम मे कतेको धिया पुता अछि जेकरा अन्दर ज्ञान, विज्ञाण आ कला कुटि कुटि क भड़ल अछि, मुदा, बेकार पड़ल अछि । जतेक समय हम अधलाह काज मे लगबैत छी, जँ ओतेक समय, बल आ बुद्धि निक काज मे लगाबी त अपना संग समाज आ देश दुनूक विकाश होएत ।(सभ ताली पीटैत अछि)
पुनः सभ गोटेके हमर प्रणाम !!!!
पर्दा खसैत अछि
दृश्य दशम समाप्ति