रविवार, 22 जून 2014

 संसार में तीन तरहक वृक्ष होइत छै तीन स्वभाव के :
१. जे मात्र फूल दैत छै----जेना गुलाब
२. जे मात्र फल दैत छै ---जेना कटहर
३. जे फूल आ फल दुनू दैत छै ----जेना आम
   एहि तरहे मनुष्यक सेहो स्वभाव होइत छै :
    १. जे मात्र बजता करता किछु नहि
    २. जे करता मुदा बजता नहि
    ३. जे बजता आ करता

तुलसीदास जी रामचरित मानस मे धन  के  तीन उपयोग  बतेने  छथिन :
 १. उत्तम -----दान
  २. मध्यम ----भोग  आ
    ३. निचतम् ----नाश 
सच जँ धन के दान आ भोग नहि काएल जाए त नाश होएत।


अर्थशास्त्र सेहो कहैत छै जे धन जतेक घुमैत रहए ओतेक अर्थव्यवस्था लेल निक। 

शनिवार, 31 मई 2014

आइब  गेल आब मोदी सरकार
की बनत आब "मिथिला राज्य " ???

शनिवार, 10 मई 2014

"कनियाँ के चाही ढेउआ 
बौआ के चाही बाबू कमौआ "

"तामब दिन राइत खेत
तखने भड़त  डेड़ बिता पेट  "


 "जँ चौक चौराहा
देबै खाली गप छरक्का
पीबै भांग मारबै गजाक सौंटा
बिका जाएत सभ बाग़ बगीचा "



शनिवार, 19 अप्रैल 2014

sita




  "सीता "
एकटा नारी के एहन दशा 
केना लिखू हम हुनकर कथा ?
जे कहियो दुःख छोड़ि सुख नहि केली



केना क कहू हम हुनकर व्यथा ?
नहि आर केकरो इ बात छै 
इ त मिथिला के बेटी 
माँ सीता के छै कथा !!


जे सीता महल में रहली 
हर सुख-सुविधा में पलली
नहि जानि केकर नजैर लागल 
विआह होइते वनवाशिक जिनगी कटली ?


जखन लक्ष्मण- रेखा सीता लंघली 
सभ अवाज़ उठेलक 
मुदा इ अवाज़ कहाँ छल सभक 
जखन राम सीता के घर सँ बेललैन ?


कहाँ छैथ लोक मर्यादा पुरुषोत्तम राम 
कुन मर्यादा के इ लाज रखलैन 
गर्भवति पत्नि के देलैन छोड़ि 
केलैन सभ मर्यादाक उलंघन 
तइयो कहाबैथ पुरुषोत्तम राम ?


आदर्श छैथ नारी लेल मिथिलाक बेटी सीता 
बार बार देली अग्नि परीक्षा 
तइयो जँ लोक नहि विश्वाश केलक 
त समा गेली धरती में माँ सीता !!
आइयो हर एक डेग पर 
मिथिलाक बेटी दैत अछि अग्नि परीक्षा 
मुदा कहिया तक धरती में समेती सीता ???
      :कंचन कुमारी 






















 
























    Aadrs chatin maa sita je agani paricha daa k pabitar bhak e k elkin nai kelk keu bisws maa  sita pas ta sita dharti m sama gelkin.

gajal

छोड़ि गेलौँ  जरैत हमरा
धधकैत प्रेमक आगि मे
हम तड़पैत झड़बैत छी नोर
प्रिय हरदम आहाँक याद मे ।




अहीं छलौँ सर्वस्व हमर
नहि आर केयो संसार मे
जँ अहीं नहि भेलियै  हमर "प्रिय "
त हमर कुन मोजर संसार में ।


रखलौं सहेज हम "प्रिय"
आहाँक प्रेमक चारि दिन
आएब आहाँ होएत पुन: मिलन
रहलौं हम बैसल एहि आश मे ।


 कतेको दिवश बितल "प्रिय "
आहाँ नहि लेलौं सुधि हमर
हारल मारल जिनगी हमर
मुदा हम जीब आहाँक याद मे ।


    :गणेश कुमार झा "बावरा "